एक नया सूरज  

Posted by आशीष in

घन तिमिर से घिरि
इस नीरस धरा पर
अब नया सूरज उगाना चाहिए

आंधीयों से जूझती एक
प्राण ज्योति
इसको बुझने से
बचाना चाहिए

क्यों तिमिर बाहर
जो अन्दर
रोशनी इतनी सघन है
शीत की लहरें है हिम सी
क्यों ये फिर जलता बदन है |

क्या किरण मेरे ही अन्दर
दबी सी मर जायेगी
चेष्टा इसकी कि मिट जाए तिमिर
मिट जायेगी |

या मेरे अंतर की ज्वाला
देश को झुलसाएगी
जब तलक रोशन ना युग हो
तब तलग तड़पायेगी |

क्रांति को जन्म देने को
न शक्ति चाहिए
क्रांति मांगे समर्पण
देश भक्ति चाहिए

मै नहीं कहता कि तुम
भगवान् को ललकार दो
ना मेरी इच्छा कि सारे
तंत्र को धिक्कार दो |

तार है सूने पड़े सच्चाई के
झंकार दो
एक मानव पल रहा अंतस में है
पुकार दो |

आज तक जो स्वप्न
हम सबके ह्रदय में है पला
उस सपन को आज का
सच बनाना चाहिए

अब नया सूरज उगाना चाहिए ||

This entry was posted on Monday, July 21, 2008 at 9:43 AM and is filed under . You can follow any responses to this entry through the comments feed .

1 comments

"हो चुकी अब पीड़ पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से भी कोई गंगा निकालनी चाहिए ... दुष्यंत कुमार "
- तुम भी थोड़े क्रांतिकारी होते जा रहे हो ...संभल जाओ ,क्रांति बलिदान मांगती है !! पर रचना काफी सुन्दर है ..देशभक्ति की एक कविता की बढोतरी हुई :)

July 28, 2008 3:15 AM

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