ओ रे नीरे !
आज मचल जा कि
अब अंतस में तेरे
भाव की लहरें उठेंगी
स्वप्न के संचार होंगे
और इस नीरस धरा पर
पुष्प हर रंग का खिलेगा
ना थी मूरत
था सनाटा
आज बज जाए मंजीरे
ओ रे नीरे !
स्वप्न की दुनिया का
सच में
आज मन
संचार होगा
आज सोयेगा अँधेरा
प्रेम का उजियार होगा
आज सूखे जलधरो से
भी यहाँ पानी गिरेगा
झूम तू खुशियों में लेकिन
थोडा धीरे
ओ रे नीरे !
पतझरो में झर गया
हर पात वृक्षों से मगर
अब वास आया है वसन्तो का
अभी न शोक कर
कि अब हवाए
शीत की लहरों को अपने संग लिए
फैला रही है दूर तक सुरभि
बदन में
उठ रहे कम्पन है
जैसे ही छुआ इस
वात ने है
एक उत्सव जग में है
और एक मेरे मन में है
एक उत्सव कर रही है
पवन ये
मुझको घेरे
ओ रे नीरे !
मन ही केवल खुश नहीं है
देखो-देखो इन विहग के कलरवो को
आज ये आकाश सारा
नाप देंगे
देखो पातो की विवशता
बन्धनों में बंद है
पर आज फिर भी
चेष्टा उड़ने की है
सो मचलते है
संग हवाओं के |
लुभाते मन को मेरे
ओ रे नीरे !!
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on Sunday, July 20, 2008
at 10:00 AM
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kavita
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